सलाखों के पीछे का दृश्य!

इस प्रांत के वह नागरिक जिनके बारे में हम विचार ही नहीं करते - कैदी! जेल में बैठे वह व्यक्ति जो अपने जीवन का बहुमूल्य समय सलाखों के पीछे बिता रहे हैं। उनका हर एक क्षण कैसे गुज़रता होगा, क्या हम कभी विचार करते हैं? नहीं! क्योंकि हमारे पास इतना समय ही नहीं है, और जब समय होता है तो राष्ट्रहित की ऐसी महत्वपूर्ण बातें हमारे मन में आती ही नहीं।


कैदियों का यह विषय गंभीरता से लेने का है। भारत में जेलों की स्थिति इतनी अच्छी तो नहीं है कि हम निश्चित होकर बैठ सकें।


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पहले हैं, संदिग्ध या विचाराधीन कैदी, जो जांच के दौरान न्यायिक हिरासत में कैद व्यक्ति होते हैं। भारतीय जेलों में ऐसे क‌ई लोग काफ़ी साल से इंतज़ार में कैद होकर बैठे हैं। यदि बात कुछ समय की हो तो ठीक है परंतु इतनी लंबी अवधि में बंधकर रहना और तब यह भी नहीं पता हो कि रिहाई कब होगी, मानसिक यातना का कारण बनता है।


दूसरे कैदी वह हैं जो अपनी सज़ा पूरी भी कर चुके हैं, परंतु कड़क कानून न होने व धीमी गति से कानूनी कार्यवाही होने की वजह से आज भी कैद हैं। एक उदाहरण अहमदाबाद की जेल का है जहां एक इंटरव्यू में कैदी ने बताया कि उसकी सज़ा 14 साल की थी, जो पूरे हो चुके हैं, परंतु आज 17 वर्ष होने पर भी वह जेल में है। यह भी दूसरा कारण बनता है मानसिक यातना  का। न सिर्फ़ कैदी पर, बल्कि उसके पूरे परिवार पर, जो कि पूरी तरह मानवाधिकार का उल्लंघन भी है।


हालांकि कई ऐसी स्थितियों को देखकर उन्हें कार्य भी दिया जाता है जिससे वे स्वस्थ रहें। जैसे तिहाड़ जेल में कैदी बेकरी प्रोडक्ट्स बनाते हैं, जो काफ़ी प्रसिद्ध हैं। इस तरह की गतिविधियों के माध्यम से मानसिक रूप से स्वस्थ रखने की कोशिश की जाती है, परंतु यह सब उन्हें कुछ हद तक ही संतुष्ट कर सकता है, परंतु ख़ुश नहीं रख सकता।


दरअसल हमारे दिमाग में कैदियों की छवि कुछ इस तरह है कि वह बुरे होते हैं, व उन्हें हमेशा बुरी नज़र से ही देखा गया है। परंतु बहुत अधिक अपराध वह हैं जो किसी उद्देश्य से नहीं किए हैं, जैसे कि अधिक गुस्से में आकर किसी का मर्डर कर देना, ज़मीन-विवाद को लेकर मर्डर के किस्से हैं, जिनका कैदियों को पछतावा भी होता है, व होना भी चाहिए।


मैं यहां कैदियों के पक्ष में बात नहीं कर रही हूँ, जेलों की वास्तविकता पर चर्चा कर रही हूँ। क्योंकि अपराध चाहे किसी उद्देश्य से किया हुआ हो या बिना उद्देश्य के! चाहे गुस्से में किया हुआ हो या जैसे भी! अपराध, "अपराध" ही रहेगा। और उसका उचित दंड भी मिलना चाहिए। परंतु जब बात मानवाधिकार के उल्लंघन पर आ जाए तो देश के लिए भी ठीक नहीं है। इसीलिए ज़रूरी है कि उचित कदम उठाए जाएं।


ज़रुरत से ज़्यादा कैदी न हों, विचाराधीन कैदियों की संख्या घटे, जेलों में आपराधिक गतिविधियां खत्म हों, महिला कैदियों व उनके बच्चों को सुरक्षा मिले और इसके अलावा जेलों की जो ख़राब स्थिति है उसमें सुधार होना चाहिए। अर्थात् कैदियों को इस तरह रखना चाहिए कि उन्हें पर्याप्त सज़ा मिले जिससे उन्हें अपने कार्य पर पछतावा भी हो व मानसिक यातना न हो, और जेलों में होने वाली आत्महत्याएं भी कम हो सकें।


धन्यवाद ।


- अंशिका चतुर्वेदी 




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