कैलाश - एक शक्ति!

 “ कैलाश - जहाँ भटके कदम ठहर जाते हैं,

और अंधेरों में भी दीप जल जाते हैं। ”


 - अंशिका चतुर्वेदी




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पृथ्वी-गगन के बीच ठहरता है स्वप्न अनोखा,

"धुरी" जहाँ से ब्रह्माण्ड का सारा विस्तार है;

समय-स्थान का संगम रुककर देता सन्देश,

मन में जैसे मौन शांति का आधार है!


रहस्यों से भरा है यह पावन अद्भुत धाम,

जहाँ विज्ञान भी हार गया अनेकों बार;

हर तर्क यहाँ मौन हो जाता निष्काम,

हर उत्तर गिरता, टूटता बार-बार!


एक ओर है मानसरोवर- निर्मल, शांत, स्थिर,

जिसका स्पर्श आत्मा को पवित्र कर जाए;

हथेली पर जैसे थाम लिया कोई चित्र,

जहाँ हर लहर जीवन को नया अर्थ दिलाए!


दूसरी ओर आधे चाँद-सी गहरी झील,

जिसमें अंधकार और खारापन समाया;

जीवन के अभाव का नीरव, सुनसान सिलसिला

मानो दुःख का सागर वहीं ठहराया!


दोनों ही विपरीत रूप- सुख और दुःख के रंग,

मानव जीवन का शाश्वत प्रतिबिम्ब बनते हैं;

एक रोशन दीप, एक अंधियारे का संग,

ये पर्वत के रहस्य युगों से सुनते हैं!


वह अडिग शिला, जिसमें शिव का वास है,

जिस पर अरबों प्रार्थनाएँ सफल रहीं;

किंतु जो चढ़ने चला, वह पीड़ा का दास है,

धरती पर लौट आया- थका, और टूटा कहीं!


क्या चमत्कार! जहाँ चढ़ते ही केश बढ़ते,

मुख पर रेखाएँ, और उमर का मर्म झलकता;

हर यात्री को अपने सत्य की सीख दिलाए,

समय स्वयं इस शिखर पर पहरेदार बनता!


है यह स्थल अद्भुत, अविश्वसनीय, अकल्पनीय,

जहाँ बुद्धि हार जाए, और मौन जीत जाए;

नमन उस शक्ति को- शाश्वत और दिव्य,

जो युगों से अपनी आभा हम तक पहुँचाए!


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