"रिटायरमेंट" - पूर्णविराम या एक शुरुआत ?


यह मेरा हिन्दी भाषा में पहला ब्लॉग है। आज का जो विषय है, सोचा कि सभी तक पहुंचे, यही वजह रही कि इसे हिंदी में लिख रही हूँ और आगे भी क‌ई ऐसे विषय पर लिखूँगी।


(Source : Istockphoto )







कल दिनांक 30/09/2022 को मैं माननीय श्री जिला एवं सत्र न्यायाधीश महोदय जी की रिटायरमेंट पार्टी में गई थी, जहां मुझे विशेष रूप से गीत प्रस्तुति के लिए आमंत्रित किया गया था। काफ़ी अच्छा माहौल था और शानदार अनुभव रहा। बस एक शब्द था जो मैं बार-बार सुन रही थी, "रिटायरमेंट"। अच्छा! बात यह है कि किसी भी विषय की गहराई तक जाने की इच्छुक हमेशा से रही हूँ। कल वहाँ उस शब्द को भी जान रही थी। कुछ लोगों के मुताबिक मेरी उम्र उतनी तो नहीं है कि उस विषय पर कुछ कह सकूँ, लेकिन फ़िर भी लिखूँगी, क्योंकि वास्तविकता में जो नज़र आ रहा है, अर्थात् जो आप आँखों से देख रहे हैं, कहीं न कहीं वह भी आपको बहुत कुछ सिखा रहा  है। अर्थात् किसी और के अनुभवों से आप स्वयं भी कुछ अनुभव ही करते हैं। 

जो कहानी अब मैं बताने जा रही हूँ, इसका कल की पार्टी से कोई ताल्लुक नहीं है।


दो व्यक्ति थे। एक सिद्धार्थ शर्मा और दूसरे समर्थ आहूजा। दोनों की उम्र में मात्र कुछ महीनों का ही अंतर था, अर्थात् दोनों एक ही साल में रिटायर हुए थे। दोनों ही व्यक्तियों ने अपने कार्यकाल में मेहनत और लगन से कार्य किया। दफ़्तर के लोग काफ़ी खुश रहते थे और दोनों की ही बहुत चर्चा थी। रिटायर होने के आखिरी दिन तक सब ठीक रहा, परंतु जो समर्थ थे वह बीतते वक्त के साथ-साथ अपने जीवन का उद्देश्य देखने में असमर्थ होते जा रहे थे। रिटायर होने के पश्चात दिन भर खाली बैठा करते थे। खालीपन ने उनके इर्द-गिर्द अपना आशियाना बनाना शुरू कर दिया।


( Source : iStock )










अप्रसन्नता, दुःख और निराशा जैसी भावनाएं थीं जो उन पर हावी होती जा रहीं थीं, और एक समय ऐसा आया जब वह मानसिक तकलीफों के साथ-साथ शारीरिक कष्ट भी झेलने को मजबूर हो गए। उच्च रक्तचाप व हृदय रोग से पीड़ित हो गए। और इन सभी हालातों के पीछे का कारण कुछ और नहीं, बल्कि यह था कि वह अपने रिटायरमेंट के पश्चात खुद को लाचार समझ बैठे। वह सोचते थे कि "मैं रिटायर हो गया हूँ, अब किसी काम का नहीं! जो लोग ऑफिस में मेरे आसपास घूमते थे, जो नाम चलता था, वैसा कुछ भी नहीं रहा!" और ऐसे नकारात्मक विचारों को हावी होने देकर समर्थ ऐसी स्थिति में आ गए जहाँ उन्हें परेशानियाँ घेरने लगीं।


वहीं दूसरी ओर जो सिद्धार्थ शर्मा थे, उन्होंने जॉब में रहते हुए जितनी ख़ुशी देखी उससे दोगुनी रिटायर होने के बाद देखने लगे। रिटायर होकर एन.जी.ओ. शुरू किया, जहां बच्चे और महिलाओं के विकास के लिए काम करना आरंभ हुआ। जब उन्हें नौकरी के 30 साल तक सिर्फ़ दफ़्तर के लोग जाना करते थे, अब उनकी नौकरी सिर्फ़ वहीं तक सीमित ना रही, समाज सेवा ने उन्हें इतना आगे बढ़ाया कि वह अपने आप को पहले से भी ज़्यादा खुश और व्यस्त महसूस करने लगे।


( Source : Istockphoto)









तो यह थी दो व्यक्तियों की कहानी जो लगभग एक ही उम्र के थे परंतु विचारों में था अंतर, जिसने जैसा सोचा, कार्य किया, उसका जीवन भी वैसा ही हुआ। नीचे लिखी हुई कुछ बातें हैं जो यदि हम याद रखें व आज़माएं तो हमारे अंदर का व्यक्तित्व भी बदलता है, और ऐसी कोई चीज़ नहीं जो हमें निराश कर सके।


‌‌1. "रिटायरमेंट", यह शब्द अपने आप में सिर्फ़ इतना ही दर्शाता है कि आप जिस नौकरी में थे, वह आपने पूर्ण की। अर्थात् जीवन का एक और  चरण आपने पार किया। लेकिन क‌ई लोग हैं जो यह सोचते हैं कि एक तरह से जीवन से ही रिटायर हो गए, परंतु ऐसा हरगिज़ नहीं है! परिभाषा समझिए! वह आपके जीवन का सिर्फ़ एक चरण था, एक हिस्सा था। अब तो आपके पास यह अवसर है सोचने और करने का कि किस क्षेत्र में अपना योगदान दे सकते हैं।


2. यह बात सच है कि जब आप जॉब में होते हैं, तो बात कुछ और होती है। परंतु यदि आप चाहें, तो उसके बाद की बात भी कुछ और ही हो सकती है। कुछ ऐसा कीजिए जिसमें आपकी रुचि हो। हो सकता है कि वह समाज से जुड़ा हो, या, ना भी हो। मेरा मानना समाज से जुड़ा होना है या नहीं, इससे फ़र्क नहीं पड़ता! परंतु आपको किस कार्य में खुशी मिलती है, उससे फर्क पड़ता है। लोगों को खुश देखकर यदि आप खुश होते हैं, तो उनके लिए कुछ कीजिए। या फिर स्वयं की कुछ कलाएँ हैं, जिसकी लोग प्रशंसा करते हैं और आपको ख़ुशी होती है, तो वह कीजिए, बस खाली मत बैठिए।


(Source : Book cover {Fritz Gilbert})








3. अब अपने आप को शारीरिक और मानसिक रूप से भी स्वस्थ रखिए। योग और ध्यान  यह दोनों तो मैं जीवन भर ही करने की सलाह दूँगी, परंतु अब आप इस पर और ज़्यादा समय दे सकते हैं, क्योंकि मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही ज़रूरी है जितना कि शारीरिक।


4. कोई ना कोई ऐसी रुचि हर किसी की होती है जो अपने कार्यकाल में व्यस्तता की वजह से पूरी नहीं कर पाते। उन्हें खोजिए और कीजिए। जो आप पहले नहीं सीख पाए, उसे अब सीखिए। कोई उम्र नहीं होती है सीखने की! जीवन स्वयं ही हर चरण पर, हर दिन, जीवन के अंत तक कुछ न कुछ नया सिखाता है, सीखिए!


iStock 







5. आख़िरी बात यही कहूँगी कि जो शीर्षक था ,"रिटायरमेंट", वह सिर्फ़ कुछ प्रतिशत ही "पूर्णविराम" है। क्योंकि आप अपनी नौकरी से रिटायर हो रहे हैं, जिस नौकरी में आप थे उसमें वापस नहीं जा सकते, वहां पूर्ण विराम लगा हुआ है। बाकी जो आपको उन दिनों मिला, वह अनुभव है, जो आपके साथ हमेशा रहेगा।  बाकी प्रतिशत उस न‌ए अवसर का है, जिसमें आप आगे अपनी ख़ुशी व रुचि से कार्य करना चाहते हैं। 


स्वयं को कभी लाचार ना समझना, हर उम्र में मानसिक व शारीरिक रूप से स्वयं को फुर्तीला बनाए रखना व खुश रहने में ही भलाई है। दुनिया में कोई ऐसी चीज़ नहीं है, जो आपकी ख़ुशी छीन ले। दुःख/ख़ुशी की वजह 99% समय सिर्फ़ आप स्वयं ही होते हैं।


यह ईश्वर द्वारा प्रदान किया हुआ एक सुंदर जीवन है। ख़ुश रहने की वजह ढूंढिए। अपने अंदर से खुद को तब खुश पाएंगे, जब आप खुद को समझकर वह कार्य करेंगे जो आप करना चाहते हैं।



( Source : 123RF)









मिलते हैं फ़िर किसी और विषय के साथ कुछ दिनों बाद ..


स्वस्थ रहिए ,

और खुश रहिए ।



धन्यवाद !


- अंशिका चतुर्वेदी




Comments

Popular posts from this blog

TERRITORY : A GLIMPSE FROM BANDHAVGARH

कैलाश - एक शक्ति!

WHEN TRUMP TAXED FRIENDSHIP